बदरा
नित काली रात बदरा छुपके आये, भरल पानी लादे अहंकार का गरजाए, सावन भादो छुपाये अम्बर अपने पंख फैलाये, खोवत अस्तित्व ज्यूँ-ज्यूँ बरसत जाए।
mann ke tarango ko utarne ki bas ek koshish, uthte hue saawalon ke jawab janne ki ek koshish.......